दिल की बातें दिल से

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दिवाना था मैं पहले भी मगर इतना नहीं था

Posted On: 23 Apr, 2013 में

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न जाने क्या हुआ मुझको कभी ऐसा नहीं था॥

दिवाना था मैं पहले भी मगर इतना नहीं था॥


मैं उससे प्यार करता था कभी कहता नहीं था॥

मेरी आँखों में उसने झांक के देखा नहीं था॥


मोहब्बत इश्क़ उलफत हुस्न आख़िर क्या बला है,

तुम्हारे मिलने से पहले कभी समझा नहीं था॥


न जाने कौन से रिश्ते की मज़बूरी थी उसकी,

वो मेरे साथ था लेकिन कभी मेरा नहीं था॥


खुले थे दिल के दरवाजे तेरे ख़ातिर हमेशा,

कभी भी तुम चले आते तुम्हें रोका नहीं था॥


ज़माने में हसीं लाखों हैं लेकिन तेरे जैसा,

मेरी आँखों ने दुनिया में कभी देखा नहीं था॥


तेरे आने से पहले सूनी थी दिल की हवेली,

जहां पर कोई भी मिलने कभी आता नहीं था॥


हमारे हर तरफ दीवार ही दीवार बस थी,

कोई खिड़की नहीं थी कोई दरवाजा नहीं था॥


मैं उसको जानता हूँ कुछ न कुछ तो बात होगी,

कभी चेहरे पे उसके इतना सन्नाटा नही था॥


बहारों से कभी दिल का चमन आबाद होगा,

ख़िज़ाँ में रहनेवाला ये कभी सोचा नहीं था॥


उसे मालूम था कि ख़ुदकुशी अच्छी नहीं है,

मगर इसके अलावा और भी रस्ता नहीं था॥


जिसे अपना समझता था वो मुझको ग़ैर समझा,

मुझे इस बात का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था॥


लिपटकर रो पड़ा मैं मील के पत्थर से “सूरज”

सफ़र में इस क़दर भी मैं कभी तन्हा नहीं था॥


डॉ॰ सूर्या बाली”सूरज”



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Fleta के द्वारा
July 11, 2016

I have to agree with Jeff- Lynch’s vision is so ingrained for me as the Duniverse- it’s characters are who I always picture. Sadly it was just so confusing to anyone who hadn’t read the book first.(Music was good topnp&nbs);&nbso;&!bsp; 

yogi sarswat के द्वारा
April 25, 2013

जिसे अपना समझता था वो मुझको ग़ैर समझा, मुझे इस बात का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था॥ लिपटकर रो पड़ा मैं मील के पत्थर से “सूरज” सफ़र में इस क़दर भी मैं कभी तन्हा नहीं था॥ बहुत खूबसूरत अल्फाजों से सजी सुन्दर ग़ज़ल ! बहुत बहुत बधाई आदरणीय श्री बाली जी

jlsingh के द्वारा
April 25, 2013

आदरणीय डॉ. साहब, प्रणाम! आप आए समझो बहार फिर से आई है! शमा जलेगी इतनी कभी सोचा नहीं था!

yamunapathak के द्वारा
April 24, 2013

पुनः एक उम्दा ग़ज़ल के साथ आप मंच पर आये सुखद लगा बहुत-बहुत बधाई .

AJAY KUMAR CHAUDHARY के द्वारा
April 24, 2013

आदरणीय सूरज साहब !! बहुत दिन बाद आपका दीदार हुआ… बन्दों से क्या खता हुई जो चेहरा न आपका निगार हुआ…! उम्दा ग़ज़ल शुक्रिया !

shashibhushan1959 के द्वारा
April 24, 2013

आदरणीय डाक्टर साहब, सादर ! एक लम्बे अंतराल के बाद आपकी रचना पढ़ने को मिली ! बहुत अच्छा लगा ! जिंदगी के बहुत से पहलुओं को छूती रचना ! बेहद प्रभावी! “यहीं तो जिंदगी और जिंदगी के हैं फ़साने ! किउसका हाल ये होगा, कभी सोचा नहीं था !” हमेशा साथ रहते थे न जाने क्या हुआ अब, बने हैं चाँद द्वितीया का, कभी सोचा नहीं था !!”" हार्दिक बधाई !

    jlsingh के द्वारा
    April 25, 2013

    आदाब अर्ज है ! द्वितीया का चाँद, और दिन का सूरज दोनों ही एक साथ! अब हमें पता नहीं रास्ता किधर से बनाना होगा !

    shashi bhushan के द्वारा
    April 29, 2013

    कगरिया के निकल जाईं ………….!!!!!!!!!

sudhajaiswal के द्वारा
April 23, 2013

आदरणीय सूर्या जी, सादर अभिवादन, बहुत खूब! बधाई |


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