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कौन आकर डाल देता है नमक फिर घाव में

Posted On: 23 Nov, 2012 में

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अब दरारें पड़ रही हैं आपसी सदभाव में॥


मिट रही इंसानियत है मज़हबी टकराव में॥



वक़्त के मरहम से जब भी दर्द हो जाता है कम,


कौन आकर डाल देता है नमक फिर घाव में॥



आंधियाँ तूफ़ान गर्मी और सूनामी बढ़ीं,


जीना मुश्किल हो रहा है मौसमी बदलाव में॥



बाप माँ के बीच अनबन है तो इनका दोष क्या,


पिस रहे मासूम जो परिवार के अलगाव में॥



देश की पतवार है अब जाहिलों के हाथ में,


कौन ख़तरा मोल लेगा डगमगाती नाव में॥



किसको फुर्सत है यहाँ जो क़द्र रिश्तों की करे,


टूट जाएँगे घराने आपसी बिखराव में॥



चार दिन की ज़िंदगी “सूरज” न इतना नाज़ कर,


कुछ नहीं रखा है झूंठी शान झूँठे ताव में॥


डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”



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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

D33P के द्वारा
December 12, 2012

आदरणीय सूरज जी…….नमस्कार सामाजिक बदलाव और रिश्तो के मध्य बढती दूरियों को बयां करती सुन्दर रचना .

    December 12, 2012

    दीप्ति जी नमस्कार ! आज ग़ज़ल हुस्न, महबूब और साक़ी – मीना से बाहर आ रही है और आम आदमी की ज़िंदगी की परेशानियों से रूबरू हो रही है…इसलिए अब ग़ज़लों का ये रंग भ आपको दिख रहा है…आपने रचना को सराहा और हौसला बढ़ाया इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

yamunapathak के द्वारा
December 2, 2012

जब कभी ज़िंदगी हारने लगे,अपने देखे ख्वाब ही डराने लगे दो पल के सुकून तलाश लें,हम इस अनुपम मंच की छाँव में आपकी सुन्दर सी ग़ज़ल में चाँद पंक्तियाँ जोड़ दी हैं बगैर आपकी इज़ाज़त के. शुक्रिया

    December 11, 2012

    यमुना जी नमस्कार ! एक रचनाकार को कुछ लिखने के लिए किसी की इजाजत की जरूरत नहीं होती…आपने चंद पंक्तियाँ से नवाजा ॥अच्छा लगा। आपका बहुत बहुत शुक्रिया॥

sinsera के द्वारा
December 2, 2012

आदरणीय डॉ सूर्य जी , नमस्कार , with due regards, एक बात पूछना चाहती थी ….. आप अपने मरीजों का इलाज दवा से करते हैं या शायरी से ……???? कहते हैं कि.. “चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्मे शहरे हुस्न नहीं, वर्ना दिलबर नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है…”

    December 11, 2012

    सरिता जी। मरीज को आराम मिलना चाहिए माध्यम मायने नहीं रखता…..अगर दिल को सुकून और मन में शांति मिले तो दवा, दुआ और शायरी सब जायज़ है …आपका कोट किया गया शेर बहुत उम्दा है॥आपकी दाद के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया॥

shashibhushan1959 के द्वारा
November 26, 2012

आदरणीय डाक्टर साहब, सादर ! बहुत सुन्दर रचना ! “”वक़्त के मरहम से जब भी दर्द हो जाता है कम, कौन आकर डाल देता है नमक फिर घाव में॥”" सचमुच आज यही हाल है ! “”किसको फुर्सत है यहाँ जो क़द्र रिश्तों की करे, टूट जाएँगे घराने आपसी बिखराव में॥”" “”टूट जाएँगे घराने”" नहीं बल्कि अब तो घराने ही दुर्लभ हो गए हैं ! जीवन के विविध रंगों को उकेरती रचना ! हार्दिक बधाई !

    November 26, 2012

    शशि भूषण जी सादर नमस्कार!, आपकी हौसला अफजाई करती हुई सुंदर प्रतिक्रिया मिली बहुत अच्छा लगा। आजकल कहीं ग़ायब हैं क्या? दिखाई नहीं दे रहे हैं मंच पे या फेसबुक पर .. सब कुशल मंगल है ना?

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 24, 2012

अति संवेदनशील रचना। बधाई

    November 24, 2012

    यतीन्द्र भाई आपका बहुत बहुत धन्यवाद। ऐसे ही उत्साहवर्धन करते रहें। साभार

nishamittal के द्वारा
November 24, 2012

डाक्टर साहब आपकी सभी रचनाएँ एक से बढ़कर एक होती हैं,और उनकी प्रशंसा के लिए हमारे पास शब्द नहीं होते .शुभकामनाएं

    November 24, 2012

    निशा जी नमस्कार ! बहुत दिनों के बाद ब्लॉग पर आगमन पर आपका बहुत बहुत स्वागत और हार्दिक अभिनंदन। आपकी प्रशंसा से उत्साह बढ़ता है। आपका बहुत बहुत आभारी हूँ। स्नेह बनाए रखें!

jlsingh के द्वारा
November 23, 2012

आदरणीय डॉ. साहब नमस्कार! वैसे तो हर एक शब्द अनमोल है! फिर भी रेखांकित करने के लिए दो पंक्ति चुन रहा हूँ- देश की पतवार है अब जाहिलों के हाथ में, कौन ख़तरा मोल लेगा डगमगाती नाव में॥ कृपया लिखते रहें गुदगुदाते रहें, जगाते रहें और हम वाह वाह ! वाह वाह! करते रहें!…. आमीन!

    November 24, 2012

    जवाहर भाई सादर नमस्कार ! आपके ये उत्साहवर्धक शब्द बहुत हौसला बढ़ते हैं और इससे भी अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करते हैं ….आपका बहुत बहुत धन्यवाद! साभार

akraktale के द्वारा
November 23, 2012

आदरणीय डॉ. बाली जी                            सादर, बहुत सुन्दर गजल के लिए बधाई स्वीकारें.लगातार हुई दो सामयिक घटनाओं कि इसमें झलक दिख रही है. पुनः बधाई स्वीकारें.

    November 24, 2012

    अशोक भाई नमस्कार ! ऐसी घजाले बस हो जाती हैं…आप बिलकुल सच कह रहे हैं…बस बैठे बैठे उन्हीं घटनाओं को सोचते हुए ये ग़ज़ल कह डाली । आपको पसंद आई मुझे अच्छा लगा। आपका बहुत बहुत शुक्रिया

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 23, 2012

आदरणीय सूरज जी, सादर अभिवादन वर्तमान का सही चित्रण सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई.

    November 23, 2012

    जी प्रदीप जी सादर नमस्कार ! आपको रचना पसंद आई और आपका आशीर्वाद मिला इसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।


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