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लीटर से नापता है मेरा क़द वो आजकल

Posted On: 14 Oct, 2012 में

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मुझको बता रहा है मेरी हद वो आजकल।

लगता है भूल बैठा है मक़्सद वो आजकल॥


उसका मुझे परखने का अंदाज़ देखिये,

लीटर से नापता है मेरा क़द वो आजकल॥


हल्के हवा के झोंके भी जो सह नहीं सका,

कहता फिरे है अपने को अंगद वो आजकल॥


अदना सा एक दाना जो मिट्टी में मिल गया,

तन के खड़ा है दुनिया में बरगद वो आजकल॥


अंदाज़ जश्न का भी अलग उसका है बहुत,

मुझको रुला के होता है गदगद वो आजकल॥


रिश्तों की बात करता नहीं है किसी से वो,

घायल हुआ है अपनों से शायद वो आजकल॥


कल तक पकड़ के चलता था जो मेरी उँगलियाँ,

कहने लगा है अपने को अमजद वो आजकल॥


जिसे अपनी ज़िंदगी का ही मक़्सद नहीं पता,

पहुंचा रहा है औरों को संसद वो आजकल॥


“सूरज” बना के उससे ज़रा दूरियाँ रखो,

झुक झुक के कर रहा हैं ख़ुशामद वो आजकल॥


डॉ. सूर्या बाली “सूरज”



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54 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shermaine के द्वारा
July 11, 2016

You are right I have never heard of this gentleman before but if what this article says is correct then I look forward to taking his advice. I am thrilled for you if your business has become more successful due to listening to this gete;nman&#8217ls advice and lectures. Thank you for bringing this advice to the table I will look into this again and see if I can benefit from his advice as well!

Bhagwan Babu के द्वारा
October 23, 2012

सूरज जी पह्ली बार आपका ग़ज़ल  पढा पढकर खुशी हुई एक एक लफ्ज़ नाप तौल कर, धागे मे मोती पिरोने जैसा लगा हर एक छ्न्द प्रभावशाली अर्थ लिये हुए …… बहुत उम्दा … बहुत खुब http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2012/10/22/%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%96%E0%A4%BC%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%89%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6-%E0%A4%B9%E0%A5%88/

    October 24, 2012

    भगवान बाबू जी नमस्कार !! आपको ग़ज़ल पसंद आई और आपकी दाद मिली। इसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

D33P के द्वारा
October 22, 2012

मुझको बता रहा है मेरी हद वो आजकल। फिर भी वो घूमता है मेरे चारो तरफ आजकल ….. सूरज जी आपकी लेखनी इतनी उम्दा है ,पढने वाला उसमे खो जाता है और पढने वाले के अनायास कुछ शब्द जुड़ जाते है !मेरे साथ तो हमेशा यही होता है ….

    October 22, 2012

    दीप्ति जी नमस्कार ! ये तो आप का बड़प्पन है कि आप सामान्य सी रचना को आप इतना सम्मान देती हैं। और रही बात आपकी की आप ऐसी हैं ही की लोग आपके आसपास घूमेगे हीं…. शमा जलती तो परवाने आ ही जाते हैं…हाहाहाहा …..

अजय यादव के द्वारा
October 18, 2012

डॉ साहब , सादर प्रणाम | मेडिकल कालेज के एक विख्यात प्रोफेसर से ,एक महान गजल लेखक तक आप जैसा उम्दा कोई नही ……पिछले कई सालों से इलाहाबाद के लोकल समाचारों में{ मेडिकल कालेज के समाचारों में }आपके शोध पत्रों के सम्बन्ध में पढ़ता सुनता आया …गुफ्तगूं वालो से सुना कि आजकल “एम्स” भोपाल..में आप एसोसियेट प्रोफेसर हैं | मैं खुद एक मेडिकल छात्र हूँ …..और आपकी गज़लों का बहुत बड़ा प्रशंसक |आपके ब्लॉग पर मेरा प्रथम आगमन हैं और खुद बड़ा रोमांचित महसूस कर रहा हूँ कि जे जे का शुक्रिया जिसने मुझे एह सम्मान दिया कि आपकी रचनाओ पर कुछ सकारात्मक कमेन्ट कर सकूँ | अजय http://avchetnmn.jagranjunction.com/

    October 18, 2012

    अजय जी आपकी  इतनी भावुक और आत्मीयता से भरी प्रतिक्रिया पढ़कर बहुत अच्छा लगा। वैसे मैं इतना योग्य नहीं जितना आपने तारीफ कर दी। हाँ मैं पहले इलाहाबाद में था और अब भोपाल शिफ्ट कर गया हूँ। कभी वक़्त मिले तो मेरा वेब पेज : http://www.drsuryabali.com जरूर देखें । आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

अजय यादव के द्वारा
October 18, 2012

डॉ साहब , सादर प्रणाम | मेडिकल कालेज के एक विख्यात प्रोफेसर से ,एक महान गजल लेखक तक आप जैसा उम्दा कोई नही ……पिछले कई सालों से इलाहाबाद के लोकल समाचारों में{ मेडिकल कालेज के समाचारों में }आपके शोध पत्रों के सम्बन्ध में पढ़ता सुनता आया …गुफ्तगूं वालो से सुना कि आजकल “एम्स” भोपाल..में आप एसोसियेट प्रोफेसर हैं | मैं खुद एक मेडिकल छात्र हूँ …..और आपकी गज़लों का बहुत बड़ा प्रशंसक |आपके ब्लॉग पर मेरा प्रथम आगमन हैं और खुद बड़ा रोमांचित महसूस कर रहा हूँ कि जे जे ने मुझे एह सम्मान दिया कि आपकी रचनाओ पर कुछ सकारात्मक कमेन्ट कर सकूँ | अजय

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 17, 2012

आदरणीय सूरज सर जी, मैं पहली बार आपके ब्लॉग पर आयी हूँ और बहुत ही ख़ुशी हुई आपकी ग़ज़ल पढ़ कर क्योंकि मुझे ग़ज़ल बहुत अच्छे लगते है | रिश्तों की बात करता नहीं है किसी से वो, घायल हुआ है अपनों से शायद वो आजकल॥ बहुत अच्छे भाव दिये है आपने अपनी ग़ज़ल को बहुत-बहुत बधाई |

    October 17, 2012

    धवलिमा जी नमस्कार ! आपका ब्लॉग पे प्रथम आगमन पर स्वागत है। अगर आप वाकई ग़ज़लों की शौकीन हैं तो सही जगह पहुंची हैं…आशा करता हूँ मेरी ग़ज़लें आपकी तलाश पूरी कर सकेंगी। आप अपनी प्रतिकृया से जरूर अवगत कराये। आपकी सुंदर प्रतिकृया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

vaidya surenderpal के द्वारा
October 17, 2012

लीटर से नापता है मेरा कद वो आजकल… बहुत अच्छी गजल के लिए बधाई ।

    October 17, 2012

    वैद्य जी सादर नमस्कार। आपका ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है आपको ग़ज़ल अच्छी लगी और आपकी दाद मिली इसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया॥

yogi sarswat के द्वारा
October 17, 2012

उसका मुझे परखने का अंदाज़ देखिये, लीटर से नापता है मेरा क़द वो आजकल॥ हल्के हवा के झोंके भी जो सह नहीं सका, कहता फिरे है अपने को अंगद वो आजकल॥ मेरे पास तो अलफ़ाज़ भी नहीं हैं आपकी काबिलियत नापने के लिए श्री बाली जी ! बस आपके अश’आर पढ़कर खुश हो लेता हूँ ! बहुत सुन्दर

    October 17, 2012

    योगी जी नमस्कार ! …………..और मेरे पास आपको शुक्रिया अदा करने के लिए अल्फ़ाज़ नहीं हैं…ये तो आपका प्यार और बड़प्पन है मित्र जो आप इतनी तारीफ करते हैं वैसे मैं इस काबिल नहीं। आपको मेरे शेर पसंद आते हैं यही मेरे लिए सबसे बड़ी पूंजी है…आपका बहुत बहुत शुक्रिया॥

ANAND PRAVIN के द्वारा
October 16, 2012

आदरणीय सूरज सर, सादर प्रणाम आपकी गजल की क्या तारीफ़ करूँ सर…….सुन्दर अर्थ और बहुत ही गहरे भावों को दर्शाती पन्तियाँ जिसे अपनी ज़िंदगी का ही मक़्सद नहीं पता, पहुंचा रहा है औरों को संसद वो आजकल॥ वास्तव में लोग ऐसे ही होतें है…………..

    October 17, 2012

    आनंद जी नमस्कार ! कैसे हो आप ? बहुत दिनों से संवाद हीनता की स्थिति से बाहर आया हूँ। और इस ग़ज़ल पर सुंदर प्रतिक्रिया प कर मन पप्रसन्न है। बहुत बहुत धन्यवाद।

Santlal Karun के द्वारा
October 16, 2012

डॉ. बाली जी, अच्छी हिंदी ग़ज़ल के लिए हार्दिक सद्भावनाएँ ! यह शे’र मुझे अधिक प्रभावित करता है — “जिसे अपनी ज़िंदगी का ही मक़्सद नहीं पता, पहुंचा रहा है औरों को संसद वो आजकल॥”

    October 17, 2012

    संत लाल जी नमस्कार। आपका ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है। आपको ग़ज़ल का ये शेर पसंद आया और आपकी दाद मिली। बहुत अच्छा लगा। आपका धन्यवाद।

rekhafbd के द्वारा
October 16, 2012

आदरणीय सूरज जी , अंदाज़ जश्न का भी अलग उसका है बहुत, मुझको रुला के होता है गदगद वो आजकल॥,अति सुंदर अभिव्यक्ति ,हार्दिक बधाई

    October 17, 2012

    रेखा जी सादर नमस्कार! आपकी सुंदर और शशक्त प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया । स्नेह बनाए रखें !

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 16, 2012

जिसे अपनी ज़िंदगी का ही मक़्सद नहीं पता, पहुंचा रहा है औरों को संसद वो आजकल॥… नमस्कार आदरणीय डॉ साहब .. आप तो गजल के बादशाह है ..एक से बढ़ कर एक …उपरोक्त जो मैंने उदृत किया मुझे बिलकुल नयी लगी / बेबस और लाचार आम आदमी जिसे खुद अपना भविष्य नहीं पता मंजिल नहीं पता ..वो जाने अनजाने भस्ट नेताओ को सत्तासीन का देते है … बहुत-२ बधाई आपको ..

    October 17, 2012

    महिमा जी नमस्कार! आप ने इतने बड़ी पदवी देकर शर्मिंदा न करें। मैं भी एक सामान्य गजलकार हूँ लेकिन कोई उस्ताद या बादशाह नहीं॥ आपकी तारीफ और विशेष प्रतिक्रिया के लिए आपका तहे दिल से शुक्र गुजार हूँ। आपकी व्याख्या इस शेर को ऊंचाई प्रदान कर रही है….

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 16, 2012

bah रही थी हवा उड़ रही थीं जुल्फे शाने से paloo गिरा रही थी वो सीधा सादा सा बन्दा था यकीन करो बेवजह आशिक मुझे बता रही थी वो सुधर दीजिये इसे सर जी.

    October 17, 2012

    जी पेश है आप की खिदमत में: उड़ती हुई हवा में लहरा रही थी जुल्फें। शानो पे धीरे धीरे बल खा रही थी जुल्फें॥ प्रदीप जी खड़े थे बन करके सीधे साधे, दीवाना और आशिक बतला रही थीं जुल्फें॥ डॉ. सूरज

    akraktale के द्वारा
    October 17, 2012

    वाह! ये भी खूब रही. बरगद कि छाँव पाना है तो पानी भी डालिए.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 16, 2012

जिसे अपनी ज़िंदगी का ही मक़्सद नहीं पता, पहुंचा रहा है औरों को संसद वो आजकल॥ बहुत sundar प्रस्तुति. बधाई. आदरणीय सूरज जी, सादर

    October 17, 2012

    प्रदीप जी सादर नमस्कार ! आपका आशीर्वाद स्वरूप ये प्रतिक्रिया मिली और प्रोत्साहन मिला । उसके लिए आपका बहुत बहुत आभारी हूँ।

Malik Parveen के द्वारा
October 16, 2012

डॉ साहब बहुत ही सुंदर ग़ज़ल के लिए बधाई !!

shashibhushan1959 के द्वारा
October 16, 2012

आदरणीय डाक्टर साहब, सादर ! “”क्या खूब लिखा आपने बस पेट भर गया ! वरना नमक ही स्वाद बढ़ाता था आजकल !! . एक दौर था कविगोष्ठियाँ होती थी मंच पर ! यादें ही रह गई है उन दौरों के आजकल !! . बेनूर करके मंच कहीं और वो गये ! फुर्सत नहीं है “दूसरी” से उनको आजकल !! . लगता है दिन फिरने वाले हैं ! बहारें आनेवाली हैं ! चमन गुलजार होनेवाला है ! पर बूढ़े बरगद का पता नहीं लग रहा है ?

    October 16, 2012

    डॉ साहब नमस्कार …भाई आप तो बच्चे की जान लेने पे तुले हो… ताने पे ताना मारे जा रहे हो। हाहाहाहाहा…..यार कौन सी दूसरी तीसरी पकड़ ली….. दिलफेंक हूँ इतना तो चलता है । आपके इस अनोखे अंदाज़ और इतनी विस्तृत प्रतिकृया के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया॥ ये बूढ़ा बरगद कौन है? जरा रहस्य तो खोलिए?

    shashibhushan1959 के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय शाही जी, आदरणीय राजकमल जी, और शिरिमान श्वेत मूंछ्धारी आदरणीय श्री प्रदीप जी …. यहीं लोग तो हैं वो बूढ़े बरगद जिनकी शीतल छाया से भी हम आजकल वंचित से हो गए है !

    jlsingh के द्वारा
    October 17, 2012

    शशिभूषण जी सही कह रहे हैं! शीतल छाया का अभाव मुझे भी खटक रहा है!

akraktale के द्वारा
October 15, 2012

आदरणीय बाली साहब                        सादर नमस्कार, बहुत सुन्दर अशार, कम ही लोग है मंच पर जो इतनी सुन्दर गजल लिखते हैं.हार्दिक बधाई स्वीकारें.                          “सूरज” बना के उससे ज़रा दूरियाँ रखो,                           झुक झुक के कर रहा हैं ख़ुशामद वो आजकल॥                          दूरियां बनाने कि जरूरत नहीं है,अब फासले घटाइये.                          गर खुशामद कर रहे हैं हम, तो जरूर उज्जैन आइये.

    October 16, 2012

    अशोक भाई नमस्कार ॥कृपया शर्मिंदा न करिए। बस कोशिश कर लेता हूँ और वो आप जैसे गुणी जनों को पसंद आ जाए यही बहुत है मेरे लिए। आपके अच्छे शब्दों के लिए आपका बहुत बहुत आभारी हूँ। आप का आमंत्रण स्वीकार कर लिया हूँ और जल्दी ही आपको कष्ट दूंगा। आपके इस दरिया दिली के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

alkargupta1 के द्वारा
October 15, 2012

डॉक्टर साहब , हर शेर में आज के वक्त की सच्चाई बयां हो रही है बहुत दिनों बाद रचना पढने को मिली

    October 16, 2012

    अल्का जी नमस्कार ! आपको रचना पसंद आई और आपकी सुंदर प्रतिक्रिया मिली। इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद । आशा करता हूँ की आप बढ़िया से हैं।

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
October 15, 2012

वाह! वाह! क्या खूब कही है आपने. रिश्तों की बात करता नहीं है किसी से वो, घायल हुआ है अपनों से शायद वो आजकल॥ कल तक पकड़ के चलता था जो मेरी उँगलियाँ, कहने लगा है अपने को अमजद वो आजकल॥ बहुत सुन्दर पंक्तियाँ. बधाई!! डॉ. साहब.

    October 16, 2012

    राजीव जी आपका दाद कुबूल हुई आपका बहुत बहुत शुक्रिया। ऐसे ही करम बनाए रखें !

jlsingh के द्वारा
October 15, 2012

डॉ. साहब, नमस्कार! आपकी जितनी भी तारीफ की जाय कम है! आपके हर कदम का स्वागत है …. आप अपने पुराने अंदाज में आ गये हैं, मुझे बड़ी खुशी हो रही है!

    shashibhushan1959 के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय जवाहर भाई, लगता है दिन फिरने वाले हैं ! बहारें आनेवाली हैं ! चमन गुलजार होनेवाला है ! पर बूढ़े बरगदों का पता नहीं लग रहा है ?

    October 16, 2012

    आपका मैं तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ !

Santosh Kumar के द्वारा
October 14, 2012

आदरणीय डॉ.साहब ,.सादर अभिवादन आपकी रचनाएं हमेशा बेहतरीन होती हैं ,…. मूरख क्या तारीफ करेगा ,…हर शेर कुछ कहता हुआ ,.बहुत बहुत बधाई ,…आपकी उस्तादी को नमन करते हुए एक प्रयास करता हूँ ,… मार्गदर्शन का प्रार्थी हूँ बेपरवाह हुए जो मंजिल-ए-जिंदगी से परवरदिगार मंजिल देता जरूर है जो ढूँढते है हर चेहरे में राम को खुदा उनके करीब होता जरूर है ग़मों की बरसात में पी नाम का प्याला खुशिओं का उनको देखो चढ़ता सुरूर है कायनात के मालिक का हाथ जिनके सिर हो परखो जरा संभल के नहीं होता गुरूर है बिखर के जुड जाए तो करिश्मा ही होगा मालिक से किया वादा ,निभाना जरूर है टूटेगी मजबूरी छाएगी रौनक नजर-ए-इनायत उसकी नहीं अब दूर है !……..सादर आभार सहित हार्दिक अभिनन्दन

    October 14, 2012

    संतोष भाई बहुत दिनों के बाद मंच पर आपसे मुलाक़ात हुई है और आपके इतने अच्छे शब्दों के लिए बहुत बहुत शुक्रगुजार हूँ । आप इस मंच के महारथी हैं और इस छोटी लेकिन सशक्त रचना से आपने दिखा दिया की आपकी गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर कितनी कड़ी पकड़ है। आपको बहुत बहुत बधाइयाँ !

    jlsingh के द्वारा
    October 15, 2012

    मैं कुछ अपनी तरफ से न कहकर डॉ साहब की ही पंक्तियाँ दुहरा रहा हूँ, अदना सा एक दाना जो मिट्टी में मिल गया, तन के खड़ा है दुनिया में बरगद वो आजकल॥ संतोष जी को प्रणाम!

      October 16, 2012

      जवाहर भाई को नमस्कार ! आपकी अदा आपका जलवा आपका हुनर ….सब कुछ लाजवाब है….आप इतनी सादगी से भी बहुत कुछ रंगीन कह जाते हैं…….खैर जुगल बंदी तो जुगलबंदी होती है जो हमेशा ही मज़े देती है…..हाहाहा

sinsera के द्वारा
October 14, 2012

जब किसी से कोई गिला रखना, सामने अपने आइना रखना ….. ठीक कहा डॉ सूर्य जी आपने, आज कल यही हो रहा है, लेकिन आप दूध वाले से कहाँ उलझ पड़े….:-)

    October 14, 2012

    सिंसेरा जी आजकल लोग इंसान को गलत ढंग से आंक और परख रहे हैं …ये शेर उसीलिए था….आपको पसंद आया मेहनत सार्थक हुई…..ये दूधवाला बेचारा तो अनायाश ही हम दोनों के चक्कर में फंस गया,,,,,,,,,,,,,,,…हाहाहहहहह

    jlsingh के द्वारा
    October 15, 2012

    युगल बंदी की तारीफ तो करनी ही चाहिए …!

seemakanwal के द्वारा
October 14, 2012

जिसे अपनी ज़िंदगी का ही मक़्सद नहीं पता, पहुंचा रहा है औरों को संसद वो आजकल बहुत खुबसुरत गज़ल

    October 14, 2012

    सीमा जी आपको ये शेर पसंद आया और आपने अपने विचारों से अवगत कराया अच्छा लगा। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।


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