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कर ली आंखे चार तो फिर डर काहे का

Posted On: 2 Mar, 2012 में

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LOve

कर ली आंखे चार तो फिर डर काहे का।

सच्चा अपना प्यार तो फिर डर काहे का॥

इन रिश्ते नातों, रस्मों से क्या लेना,

हम दोनों तैयार तो फिर डर काहे का॥

हमको कोई रोक सके दम किसमें है,

तोड़ी हर दीवार तो फिर डर काहे का॥

सारे जग के आगे अपने प्यार का तुमसे,

कर डाला इज़हार तो फिर डर काहे का॥

अब चाहे ये जग रूठे या रब रूठे,

छोड़ दिया घर बार तो फिर डर काहे का॥

प्यार किया तो मरने से फिर क्या डरना,

मरना सबको यार तो फिर डर काहे का॥

रौशन होगी प्यार की राहें तेरी अब,

“सूरज” तेरा यार तो फिर डर काहे का॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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45 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kailee के द्वारा
July 11, 2016

Ca me rassure de voir que tu trouves bon, ce livre. Je ne l’ai pas lu parce que je n’aime pas Houellebecq, le personnage et que son caprice pour avoir le Goncourt était plus que ridicule. Mais si il est vraiment bon ce bouquin au moins, on peut dire qu’il est mérité ce prix (quoique en lisant le compte-rendu de la délibération du grand prix du style chez l’ami Thomas, on se dit que tant d’autres critères que l&uÃ217;8©crit#re rentrent en compte dans ces cas là).

Tufail A. Siddequi के द्वारा
March 13, 2012

डाक्टर साहब अभिवादन, बहुत सुन्दर रचना. हर पंक्ति बेहतरीन. बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    March 13, 2012

    तुफ़ैल भाई साहब नमस्कार ! ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है। आपकी तारीफ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

Salil के द्वारा
March 7, 2012

आदरणीय सूरज जी.  हर पंक्ति खूबसूरत है रौशन होगी प्यार की राहें तेरी अब, “सूरज” तेरा यार तो फिर डर काहे का॥ प्रेमगाथा बहुत पसंद आई , बधाई

    March 7, 2012

    सलिल जी नमस्कार !आपको रचना पसंद आई और आपकी स्नेहभारि प्रतिकृया मिली । आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

chandan Rai के द्वारा
March 6, 2012

रौशन होगी प्यार की राहें तेरी अब, “सूरज” तेरा यार तो फिर डर काहे का॥ आदरणीय बाली जी बहुत पसंद आई सूर्या जी,हर पंक्ति खूबसूरत है बधाई

    March 6, 2012

    चन्दन भाई नमस्कार ! ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है। आपको रचना पसंद आई और आपकी प्यारी सी प्रतिकृया मिली। उसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !!

krishnashri के द्वारा
March 4, 2012

आदरणीय बाली जी , नमस्कार , बहुत सुन्दर सीधे एवं सधे शब्दों में आपने अपने भाव को व्यक्त किया है , बधाई और होली की हार्दिक शुभकामना .

    March 4, 2012

    कृष्णाश्री जी सादर नमस्कार ! मेरे विचारों की अभिव्यक्ति को आपका समर्थन और स्नेह मिला बहुत अच्छा लगा। आपको बहुत बहुत धन्यवाद ! आपको भी होली की बधाइयाँ !!

March 4, 2012

सादर प्रणाम! कर ली आंखे चार तो फिर डर काहे का। सच्चा अपना प्यार तो फिर डर काहे का लगता है सर जी कि यह विशेष रूप से मेरे लिए लिखी गयी रचना……आपका प्यार साथ है तो प्यार कि अवश्य ही जीत होगी.

    March 4, 2012

    अनिल भाई नमस्कार ! झूँठ नहीं बोलूँगा यह रचना करते समय आपकी कहानी मेरे दिमाग मे कहीं न कहीं जरूर थी….मुझे लगा इसे एक ग़ज़ल का रूप देकर मंच तक लाऊं और वही किया भी….लोगों की सराहना मिली और आपको भी अच्छीओ लगी इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद !!

Amar Singh के द्वारा
March 4, 2012

प्यार किया तो डरना क्या….. :-) :-) http://singh.jagranjunction.com

    March 4, 2012

    अमर भाई नमस्कार ! आपका ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद !!

minujha के द्वारा
March 4, 2012

सरल शब्दों की सच्ची सी लगने वाली ये रचना बहुत पसंद आई सूर्या जी,हर पंक्ति खूबसूरत है बधाई

    March 4, 2012

    मीनू जी नमस्कार ! आपको रचना पसंद आई और आपका आशीर्वाद मिला। अच्छा लगा। आपको बहुत बहुत धन्यवाद !!

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 4, 2012

कर लीं आखें चार तो फिर …………. आदरणीय सूरज सर, सादर प्रणाम वाह युवाओं की भाषा को आप भी खूब बता रहें है ………….डरना नहीं है बस प्रेमपथ पर बढ़ते जाना है आपको प्रेमगाथा के लिए अपार बधाई

    March 4, 2012

    आनंद भाई नमस्कार !यार प्यार के अलावा तो सब कुछ मिथ्या है इस जगत में….यदि सच को न जिया गया तो सब कुछ बेकार है। ये युवा, बच्चा और बुढ़ापे सब पे लागू होता है….आपको बहुत बहुत धन्यवाद !

dineshaastik के द्वारा
March 3, 2012

सुन्दर शब्दों का श्रृंगार किये हुये मनमोहक रचना के लिये बधाई स्वीकृत करें मान्यवर….

    March 4, 2012

    दिनेश भाई नमस्कार ! आपकी तारीफ भरे शब्दों के लिए आपका आभारी हूँ आपको बहुत बहुत धन्यवाद !!

Amita Srivastava के द्वारा
March 3, 2012

डॉ बाली जी एक और सुंदर सरल प्रस्तुति…… बहुत अच्छी लगी . इस सूरज की रौशनी मंच पर बिखेरते रहिये

    March 4, 2012

    अमिता जी नमस्कार ! आपकी सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया !। ऐसे ही आशीर्वाद बनाए रखें!!

Tamanna के द्वारा
March 3, 2012

वाह, बहुत सुंदर रचना… इस  रचना ने तो मुगल-ए-आजम का गाना याद दिला दिया.. प्यार किया तो डरना क्या ….!!! http://tamanna.jagranjunction.com/2012/02/27/marriage-customs-indian-marriages-and-change-of-name/

    March 4, 2012

    तमन्ना जी नमस्कार ! बहुत दिनो के बाद मंच पर आपको पुनः पाकर बहुत अच्छा लगा। आपकी सुंदर एवं उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया मिली इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

mparveen के द्वारा
March 3, 2012

डॉ साहब नमस्कार, प्यार किया तो मरने से फिर क्या डरना, मरना सबको यार तो फिर डर काहे का॥ बहुत खूब जब मरना ही है एक दिन सबको तो डरने की क्या जरुरत है . बहुत सुंदर गीत !!! बधाइयाँ :) ……..

    March 4, 2012

    परवीन जी नमस्कार !आपने बिलकुल सही कहा ” जब मरना ही है एक दिन सबको तो डरने की क्या जरुरत है”…आपको रचना अच्छी लगी और आपकी तारीफ मिली बहुत अच्छा लगा। आपका बहुत बहुत धन्यवाद !!

yogi sarswat के द्वारा
March 3, 2012

डॉ.बाली जी सादर नमस्कार ! आप जब भी आते हैं अपने थैले में से कोई ऐसा मोती निकल कर लाते हैं जो आते ही माणिक की तरह अपनी अभा फैला देता है ! बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ! बहुत बहुत सुन्दर अल्फाज़ और अश’आरों से सजी ! साधुवाद !

    March 4, 2012

    योगी जी नमस्कार !आप जैसे क़द्रदान हो तो फिर क्या कहना । आपके सुंदर और उत्साह वर्धक शब्दो से मन प्रशन्न हो जाता है। आपको ग़ज़ल पसंद आई और आपकी दाद मिली। आपका तहे दिल से शुक्रिया!

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
March 3, 2012

बहुत सुन्दर कविता,सूर्या जी. हमको कोई रोक सके दम किसमें है, तोड़ी हर दीवार तो फिर डर काहे का सुन्दर पंक्तियाँ.

    March 4, 2012

    राजीव जी सादर नमस्कार !आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और आशीर्वाद मिला बहुत अच्छा लगा । अपना स्नेह बनाए रखे !!

ashvinikumar के द्वारा
March 3, 2012

अति सुंदर गीत ,,सूर्या बाली जी :)

    March 4, 2012

    अश्वनी जी नमस्कार । मंच पर आपका हार्दिक स्वगत है। आपने रचना को सराहा और अपनी सुंदर प्रतिक्रिया दी इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

nishamittal के द्वारा
March 3, 2012

आपने तो उस गीत की याद दिला दी जब प्यार किया ……………सुन्दर रचना.

    March 4, 2012

    निशा जी नमस्कार ! बिलकुल सही कहा…लिखते समय तो ये बात नहीं याद आई और जब आपने तुलना की तो लगा काफी कुछ वही विचार मिल रहे है…आपकी प्रतिक्रिया और आशीर्वाद के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!!

akraktale के द्वारा
March 3, 2012

आदरणीय बाली जी नमस्कार, कर ली आंखे चार तो फिर डर काहे का। सच्चा अपना प्यार तो फिर डर काहे का॥ लगातार गजलें देने के बाद ये सुन्दर सा प्यार भरा गीत सच्चा अपना प्यार तो फिर डर काहे का वाह! बहुत बढ़िया. बधाई.

    March 4, 2012

    अशोक भाई नमस्कार ! आपको ये रचना सुंदर लगी और आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया मिली इसके लिए आपका बहुत बहुत आभारी हूँ , आपका बहुत बहुत धन्यवाद !!

sadhana thakur के द्वारा
March 3, 2012

सरल भाषा में गहरा प्यार …बहुत खूब सूरज जी …………

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 2, 2012

आदरणीय बाली जी, सादर अभिवादन. प्रेमियों के लिए प्रोत्साहन. दिल के डॉक्टर तो नहीं हैं आप ..? सुन्दर भाव एवं प्रस्तुति आनंद दायक. बहुत बहुत बधाई.

    March 4, 2012

    प्रदीप जी सादर नमस्कार !आपका आशीर्वाद और तारीफ मिली बहुत अच्छा लगा। काश मैं दिल का डॉक्टर होता….! आपका बहुत बहुत शुक्रिया !!

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
March 2, 2012

रौशन होगी प्यार की राहें मेरी अब, “सूरज” मेरा यार तो फिर डर काहे का॥ ह हा प्रिय सूरज जी बहुत सुन्दर प्यार को बहुत बढ़ावा दे रहे हैं ऐसे ही लोगों को सम्हालना मुश्किल है अब आप तो ….जय श्री राधे खूबसूरत रचना …सच में जब प्यार हुआ तो डरना क्या …सारे जग के आगे अपने प्यार का तुमसे, कर डाला इज़हार तो फिर डर काहे का॥ अब चाहे ये जग रूठे या रब रूठे, छोड़ दिया घर बार तो फिर डर काहे का॥ आनंद दाई ….नैन मिला लो के बाद ये भी आई … भ्रमर ५

    jlsingh के द्वारा
    March 2, 2012

    आदरणीय भ्रमर जी, सादर अभिवादन! फोटो तो देखिये कहाँ प्यार और आंखे चार करवा रहे हैं? तरनी तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए, झुके कूल सों यूं मुकुल मन बहु विधि पाए. दिनकर देख कर शर्मा गए और अस्ताचल में समाये! महाप्रभु, धरनी धरोहर सूरज बाबु, कहाँ छुप गए थे ए तो धमाका साथ लेकर आये! सादर अभिवादन! अब काहे का डरना!

      March 4, 2012

      जवाहर भाई नमस्कार ! मालिक सब आपकी कृपा और सनीध्य का असर है….आपकी प्रतिक्रिया बहुत मजेदार लगी…कहीं छुपे नहीं थे बंधुवर ॥बस देशाटन कर रहे थे …और शहर से 8 दिन के लिए बाहर थे….आपकी प्रतिक्रिया और आशीर्वाद के धन्यवाद !!

    shashibhushan1959 के द्वारा
    March 4, 2012

    आदरणीय डाक्टर साहब, भ्रमर जी, जवाहर भाई, सादर ! “धीरे-धीरे, चुपके-चुपके फागुन आकर, सिर पर हुआ सवार तो फिर डर काहे का ! . प्यार बँट रहा लूटो जितना लूट सको, खुला हुआ दरबार, तो फिर डर काहे का ! . बेहतरीन रचना ! झूमती-झूमाती ! हंसती-गुदगुदाती ! लग रहा है, होली नजदीक है !

      March 4, 2012

      होलिया मे उड़ेला गुलाल तो फिर डर काहे का…लूटा लूटा हो शशि माल तो फिर डर काहे का॥ साथ साथ मे चले भ्रमर जी , साथे जवाहर लाल तो फिर डर काहे का….बहुत मिठास भरी हुई प्रतिक्रिया दी डॉ॰ साहब आपने ने मज़ा आ गया ! आपकी कमी बहुत खल रही थी । होली पे कुछ धमाके की उम्मीद लगा राखी है आपसे…! अपना स्नेह और आशीर्वाद ऐसे ही बनाए रखे !!

    March 4, 2012

    भ्रमर भाई नमस्कार ! आपको रचना खूबसूरत और आनंददाई लगी और आपकी सुंदर प्रतिकृया मिली। इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद !


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