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पोस्टेड ओन: 20 Jan, 2012 कविता में
टूट कर बिखरा हूँ इक पैगाम1 से।
लिख रहा हूँ ख़त किसी के नाम से॥
तुम कहाँ थे बज़्म2 में आए हो अब,
मुंतज़िर3 था दिल तुम्हारा शाम से॥
कल तलक चर्चे थे जिनके आज वो,
मारे मारे फिर रहे गुमनाम से॥
क़ातिलों के शहर में घर ले लिया,
डर नहीं लगता है अब अंजाम से॥
तय सियासत कर रही है अब हुनर,
बन रही पहचान अब ईनाम से॥
राह से भटके नहीं थे जो कभी,
पा गये मंज़िल बड़े आराम से॥
जात, मज़हब, ज़र-ज़मीनों से नहीं,
आदमी जाना गया बस काम से॥
बेवफ़ाई से किसी की टूटकर,
प्यार कर बैठा वो जाकर जाम से॥
आजकल “सूरज” चुनावी दौर में,
मिल रहे नेता जी हर आवाम से॥
डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”
1.पैगाम=संदेश 2. बज़्म=महफिल, सभा 3. मुंतज़िर= जो इंतज़ार करे
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अजनबी जबसे हमारी ज़िंदगानी हो गया अदब से चिलमन उठा रही थी अश्क़ों से अपने गाल भिगोया कभी नहीं आ गई नूर भरी दिवाली इंसान से इंसान की बातें करें उजाड़ सकता है घर वो बना नहीं सकता उसके जलवों का ऐसा असर हो गया एड्स कविता किसी से प्यार उसको भी जो हो जाता मज़ा आता किसी से प्यार करने का कोई मौसम नहीं होता गुजारे हैं जो पल संग में तुम्हारे याद आते हैं घबरा गए अगर तो कहीं के न रहोगे घर समंदर के किनारे पे बनाता क्यूँ है? चलो दिवाली आई है जब से रफ़्तार मे ये शहर हो गया झगड़ू पड़ा बीमार मेरे अस्पताल में तुझसे उलफ़त है और तुझसे आशिक़ी अपनी दिल तोड़ के गया वो किसी अजनबी के साथ निकाला मन का भरम पुतला बनाकर तुमने। मोहब्बत आज भी तुमको बुलाती है अकेले में ये पैसा जब से लोगों का ईमान हो गया रात को चाँद जब निकलता हैं राह मुश्किल है मगर चलना पड़ेगा लिख रहा हूँ ख़त किसी के नाम से लौ उम्मीदों की जलाएँ शम्आ को छोड़ के अक्सर ये परवाने नहीं जाते सवालों के घेरे में हमारे गाँव में बचपन अभी भी मुस्कराता है हमारे देश की कैसी ये हालत हो रही है(गणतन्त्र दिवस विशेष) हादसों के इस शहर में घर तुम्हारा दोस्तों। है आज भ्रष्टाचार हैप्पी न्यू इयर 2012 Diwali