दिल की बातें दिल से

www.drsuryabali.com

47 Posts

5291 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 7037 postid : 181

लिख रहा हूँ ख़त किसी के नाम से

Posted On: 20 Jan, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

टूट कर बिखरा हूँ इक पैगाम1 से।

लिख रहा हूँ ख़त किसी के नाम से॥

तुम कहाँ थे बज़्म2 में आए हो अब,

मुंतज़िर3 था दिल तुम्हारा शाम से॥

कल तलक चर्चे थे जिनके आज वो,

मारे मारे फिर रहे गुमनाम से॥

क़ातिलों के शहर में घर ले लिया,

डर नहीं लगता है अब अंजाम से॥

तय सियासत कर रही है अब हुनर,

बन रही पहचान अब ईनाम से॥

राह से भटके नहीं थे जो कभी,

पा गये मंज़िल बड़े आराम से॥

जात, मज़हब, ज़र-ज़मीनों से नहीं,

आदमी जाना गया बस काम से॥

बेवफ़ाई से किसी की टूटकर,

प्यार कर बैठा वो जाकर जाम से॥

आजकल “सूरज” चुनावी दौर में,

मिल रहे नेता जी हर आवाम से॥


डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

1.पैगाम=संदेश 2. बज़्म=महफिल, सभा 3. मुंतज़िर= जो इंतज़ार करे

| NEXT



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (22 votes, average: 4.95 out of 5)
Loading ... Loading ...

47 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Tufail A. Siddequi के द्वारा
March 13, 2012

जात, मज़हब, ज़र-ज़मीनों से नहीं, आदमी जाना गया बस काम से॥ आजकल “सूरज” चुनावी दौर में, मिल रहे नेता जी हर आवाम से॥ डाक्टर साहब बहुत बेहतरीन पंक्तियाँ. बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    March 13, 2012

    तुफ़ैल भाई नमस्कार !ये ग़ज़ल आपको पसंद आई और आपकी दाद मिली । अच्छा लगा। आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

Rakesh के द्वारा
February 3, 2012

क़ातिलों के शहर में घर ले लिया, डर नहीं लगता है अब अंजाम से॥ Super super, like like, like. :)

    February 3, 2012

    राकेश भाई नमस्कार ! आपका बहुत बहुत शुक्रिया। ऐसे ही अपना स्नेह बनाए रखें और अपने सुझावों से भी अवगत कराएं !धन्यवाद !

January 26, 2012

क़ातिलों के शहर में घर ले लिया, डर नहीं लगता है अब अंजाम से॥ . बहुत ही खूबसूरत शेर डॉ सूरज जी ! यूं समझिए…..पार ही हो गया । :)

    January 26, 2012

    संदीप भाई नमस्कार आपका बहुत बहुत शुक्रिया। बस आप लोगों का ऐसे ही हौसला मिलते रहना चाहिए…साभार

Pankaj Chandra के द्वारा
January 25, 2012

जात, मज़हब, ज़र-ज़मीनों से नहीं, आदमी जाना गया बस काम से॥ Bahut Khoob Dr Saheb !

Sumit के द्वारा
January 24, 2012
RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
January 23, 2012

बहुत खूब.डॉ.साहब. जात, मज़हब, ज़र-ज़मीनों से नहीं, आदमी जाना गया बस काम से क्या सुन्दर पंक्तियाँ हैं …

    January 23, 2012

    राजीव जी नमस्कार !रचना को आप का आशीर्वाद मिला और आपको ये शेर पसंद आया अच्छा लगा! आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !!

sumandubey के द्वारा
January 22, 2012

सूरज जी नमस्कार ,बहुत खूब लिखा है आपने तय सियासत कर रही है अब हुनर, बन रही पहचान अब ईनाम से॥ राह से भटके नहीं थे जो कभी, पा गये मंज़िल बड़े आराम से॥ जात, मज़हब, ज़र-ज़मीनों से नहीं, आदमी जाना गया बस काम से॥

    January 22, 2012

    सुमन जी नमस्कार !आपको ग़ज़ल के कुछ शेर पसंद आए और आपको ब्लॉग तक खींच लाये …अच्छा लगा आपकी प्रतिक्रिया देख कर। आपका बहुत बहुत शुक्रिया। साभार

D33P के द्वारा
January 22, 2012

कातिल मुझे तलाशता और मैं छुपता रहा खौफ से किसे पुकारू और किसे आवाज़ दू दूर से ॥ अब क़ातिलों के शहर में घर ले लिया, डर नहीं लगता है अब अंजाम से॥ सच में सूरज जी आपकी लेखनी पढकर भी कविता करने का दिल चाहने लगता है ,आपका अंदाजे बयां बहुत खूबसूरत है ॥  

    January 22, 2012

    दीप्ति जी नमस्कार ! बहुत खूबसूरत बात कही है आपने…”कातिल मुझे तलाशता और मैं छुपता रहा खौफ से, किसे पुकारू और किसे आवाज़ दू दूर से”॥ और आपकी प्रतिकृया के क्या कहने..आपकी तारीफ और ज़र्रा नवाजी के लिए बहुत बहुत शुक्र गुजार हूँ!!

dineshaastik के द्वारा
January 22, 2012

आपकी यह खूबसूरत है गजल, जो बनाये आपका कायल मुझे। बेवफाई में पिलाया जाम जो, पंक्तियाँ ये कर गईं घायल मुझे।

    January 22, 2012

    दिनेश जी …क्या बात है ! आपकी प्रतिक्रिया देने का अंदाज़ बिलकुल निराला है….इस काम को इतनी अच्छी तरह से या तो आप करते हो या डॉ॰ शशि भूषण जी करते हैं….अच्छा लगता है। आपको बहुत बहुत धन्यवाद !

Amita Srivastava के द्वारा
January 21, 2012

डॉ सूरज जी नमस्कार एक बार फिर उम्दा व बेहतरीन गजल के लिए बधाई .

    January 21, 2012

    अमिता जी नमस्कार !आपको बहुत बहुत धन्यवाद। आपकी प्रतिक्रिया के बिना तो रचना सम्पूर्ण ही नहीं हो पाती। आपका बहुत आभारी हूँ ! धन्यवाद !

vinitashukla के द्वारा
January 21, 2012

शब्दों की खूबसूरत बुनावट और भावनाओं का खूबसूरत इज़हार. बधाई सूरज जी.

    January 21, 2012

    विनीता जी नमस्कार !इस रचना को आप का प्यार और आशीर्वाद मिला। बहुत अच्छा लगा ! आपके अच्छे शब्दों और बधाइयों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !!!

allrounder के द्वारा
January 21, 2012

नमस्कार डॉक्टर साहब ” जात, मज़हब, ज़र-ज़मीनों से नहीं, आदमी जाना गया बस काम से ” बेहतरीन अल्फाज ! हार्दिक बधाई आपको !

    January 21, 2012

    सचिन भाई नमस्कार ! यह शेर मेरे भी दिल के बहुत क़रीब है…दर असल इसी शेर के कहने के बाद ही ये पूरी ग़ज़ल हुई है….इस शेर पर खास तौर से आपकी दाद मिली अच्छा लगा। आपका बहुत बहुत शुक्रिया!

krishnashri के द्वारा
January 21, 2012

डाक्टर साहब , नस्मस्कर , सुन्दर ग़ज़ल की सुन्दर पंक्तियों के लिए ढेरों बधाई एवं शुभकामना .

    January 21, 2012

    नमस्कार कृष्णाश्री जी !आपकी शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! आप अपना स्नेह ऐसे ही बरसाते रहे॥साभार !

manoranjanthakur के द्वारा
January 21, 2012

खोल के पोटरी पूछते है हाल भी जो कभी आते न थे उनके ख्याल में बहुत सुंदर

    January 21, 2012

    मनोरंजन भाई नमस्कार ! क्या खूब कहा है आपने….कमोवेश यही हाल आजके सभी राजनीतिज्ञों का हो गया है।आपकी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभारी हूँ !

mparveen के द्वारा
January 21, 2012

डॉ साहब नमस्कार, बहुत सुंदर ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें !!! हर शेर नायाब है …

    January 21, 2012

    परवीन जी नमस्कार !बहुत बहुत शुक्रिया आपकी दाद के लिए। आपकी बधाई के लिए आभारी हूँ !

Santosh Kumar के द्वारा
January 21, 2012

डॉ.साहब ,.saadar नमस्कार kamaal है !.aapke शहर में ghoote hue aapko प्रतिक्रिया दे रहा हूँ ,.. पूरी रचना अच्छी है लेकिन मेरी सबसे पसंदीदा है .. कातिलों के शहर में घर ले लिया है… …डरते तो घर काहे लेते ?…हा हा .. बहुत बहुत बधाई आपको

    January 21, 2012

    संतोष भाई को नमस्कार और संगम की नागरी में हार्दिक स्वागत और अभिनंदन ! आपने इतनी व्यस्तता के बाद भी समय निकाल कर प्रतिकृया दी उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद। मित्र मैं मेडिकल कॉलेज कैम्पस मे रहता हूँ….और चाहूँगा का आपन मेरे गरीबखाने मे तसरीफ़ जरूर लाएँ….मेरा मोबाइल नो॰ 08004794067 पर कॉल करें। आप कटीलों के नहीं दिल वालों के शहर मे हैं….अगर आप कुम्भ मेला क्षेत्र मे हो तो तो कॉल कर के लोकेशन बताएं… मिलने का इच्छा है !

akraktale के द्वारा
January 21, 2012

बाली जी सादर नमस्कार, क्या खूब ख़त लिखा है आपने. कल तलक चर्चे थे जिनके आज वो, मारे मारे फिर रहे गुमनाम से॥ राह से भटके नहीं थे जो कभी, पा गये मंज़िल बड़े आराम से॥ सुन्दर सन्देश देती पंक्तियाँ राह पकड़ तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला… बधाई.

    January 21, 2012

    अशोक भाई नमस्कार ! आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और उत्साहवर्धन के लिए कोटि कोटि धन्यवाद ! बस राह तो पकड़ लिया हूँ….देखिये मधुशाला कब आती है…..अच्छा है। साभार !

jlsingh के द्वारा
January 21, 2012

डाक्टर साहब, नमस्कार! आप भी रात को सोते नहीं ऐसा लगता है. पर जाग कर आपने नो सृजन  किया है वह अनमोल है! कुछ पंक्तियाँ जो मुझे ज्यादा पसंद आयी- जात, मज़हब, ज़र-ज़मीनों से नहीं, आदमी जाना गया बस काम से॥ क़ातिलों के शहर में घर ले लिया, डर नहीं लगता है अब अंजाम से॥ बहुत बहुत बधाई!

    January 21, 2012

    जवाहर भाई नमस्कार ! मैं तो ठहरा निशाचर और मेरा रात्रि क्रिया कलाप तो समझ मे आता है लेकिन रात के तीन बजे आप क्या कर रहे हैं? कहीं आप भी अबोध भाई तरह किसी और देश मे तो नहीं हैं???हाहा हा हा …..आपको ग़ज़ल के दो शेर पसंद आए और आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया मिली इसके लिए आपका शुक्रिया !

sadhana thakur के द्वारा
January 20, 2012

अच्छी लगी गज़ल सूरज जी ..बधाई ……….

    January 20, 2012

    साधना जी नमस्कार ! आपको ग़ज़ल पसंद आई और आपकी प्रतिक्रिया मिली उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद !!

anandpravin के द्वारा
January 20, 2012

डॉ॰ साहब को मेरा प्रणाम, . “है निडर बड़ा, ये धुप तेरा अब कौन तुझे डराएगा, जब कलम में इतनी ताकत है, इस “सूरज” को कौन डुबायेगा” आज वास्तव में देश की राजनीति का बुरा हाल हो गया है तभी तो, प्रेमरश वाले भी नेताओं की बाते करने लगे है, जोश और जूनून से भरी हुई पन्तिया हैं लगता है आपस में ही एक दुसरे से प्रतिस्पर्धा कर रही हो और कह रही हों की “हां में तुमसे बेहतर हूँ” लाजबाब शायरी को मेरा “सलाम”

    January 20, 2012

    आनंद जी नमस्कार ! आपका ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत और अभिनंदन ! आपकी इतनी अच्छी प्रतिक्रिया और दाद के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया। साभार !

alkargupta1 के द्वारा
January 20, 2012

सूरज जी , इस चुनावी माहौल को बड़े सुन्दर शब्दों से सुसज्जित ग़ज़ल के रूप में प्रस्तुत किया है चुनावी दौर में हर नेता का यही हाल होता है और बाद में उनके वायदे तो दूर चेहरा भी देखने को नहीं मिलता है…..इस सुन्दर रचना के लिए बधाई

    January 20, 2012

    अल्का जी नमस्कार ! आपकी बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ ! ग़ज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया मिली। आपका बहुत बहुत शुक्रिया!

Rajkamal Sharma के द्वारा
January 20, 2012

आदरणीय डाक्टर साहब ….. ज्नाबेआला ! माशाअल्लाह  !   सुभानअल्लाह ! क्या खूब लिखा है लेकिन एक बात …… गर इजाजत हो तो हम यह सारे जहाँ से कह दे – यह टूटे हुए दिल वाली दुखी आत्मा और नेता जी कहाँ इक्कठे हो गए ? हा हा हा हा हा हा हा हा अति सुन्दर रचना पर मुबारकबाद

    January 20, 2012

    राजकमल भाई नमस्कार ! आपकी दाद के लिए बहुत बहुत शुक्रिया । रही बात ” टूटे हुए दिल वाली दुखी आत्मा और नेता जी कहाँ इक्कठे होने की ” तो इसपर आपको आश्चर्य नहीं होने चाहिए …ये ग़ज़ल विधा की ख़ासियत होती है की इसका हर एक शेर स्वतंत्र होता है ….उसका अगले या पिछले शेर से कोई ताल्लुक रहे ये ज़रूरी नहीं…आप एक शेर मे राजनीति दूसरे मे प्यार तीसरे मे शराब चौथे मे खुदा …….को बयान कर सकते हैं। शायद अब आपकी शंका का समाधान हो गया होगा।,

rahulpriyadarshi के द्वारा
January 20, 2012

नमस्ते सूरज जी,बहुत खूब….शानदार अलफ़ाज़,दिल खिल गया. पंक्तियों ने बहुत प्रभावित किया,ख़ास तौर पर ‘क़ातिलों के शहर में घर ले लिया, डर नहीं लगता है अब अंजाम से॥ ‘

    January 20, 2012

    राहुल भाई नमस्कार ! आपका ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है। आपकी प्रथम प्रतिक्रिया पर आपका आभारी हूँ। ग़ज़ल के कुछ शेर आपको पसंद आए बहुत बहुत शुक्रिया !! साभार! सूरज

    Transport के द्वारा
    March 16, 2012

    This piece was cogent, well-wtrietn, and pithy.


topic of the week



latest from jagran