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शम्आ को छोड़ के अक्सर ये परवाने नहीं जाते

Posted On: 16 Jan, 2012 में

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कभी भी छोडकर शम्मा को परवाने नहीं जाते।

फ़ना1 हो जाते हैं लेकिन ये दीवाने नहीं जाते॥


मोहब्बत करने वाले छोड़ जाते हैं निशां अपने,

जहां से उनके चर्चे और अफ़साने2 नहीं जाते॥


ख़ुदा का नाम लेकर भीड़ से आगे निकल वरना,

जो पीछे रहते हैं वो लोग पहचाने नहीं जाते॥


वो ज़र्रे ज़र्रे में है बात गर ये हम समझ लेते,

तो उसको ढूढ़ने मस्जिद सनमख़ाने3 नहीं जाते॥


बहुत से लोग होते हैं खुशी, इशरत4, मसर्रत5 में,

अगर ग़म आए न तो दोस्त पहचाने नहीं जाते॥


सबब6 कुछ तो रहा होगा किसी पे जां लुटाने का,

कहीं पर ऐसे तो हम दिल को बहलाने नहीं जाते॥


कई पैमाने उन आँखों में मैंने देखे हैं “सूरज”,

पिला देते वो नज़रों से तो मैख़ाने नहीं जाते॥


डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

1. फ़ना=तबाह होना, मर जाना  2. अफ़साना=कहानी, किस्सा 3.  सनमख़ाना=मंदिर,

बुतख़ाना  4. इशरत=आनंद 5.  मसर्रत=ख़ुशी 6. सबब= कारण

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50 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Tallin के द्वारा
July 11, 2016

I was just looking for this info for a while. After six hours of continuous Googleing, at last I got it in your web site. I wonder what is the lack of Google strategy that do#1&82n7;t rank this type of informative web sites in top of the list. Normally the top sites are full of garbage.

Pankaj Chandra के द्वारा
January 25, 2012

dr saheb achchhi ghazal ke liye bahut bahut badhai …jitani tareefkarun kam hai..

Sumit के द्वारा
January 20, 2012

अगर कुछ करना है कमबख़्त तो मैदान में आजा, जो रहते भीड़ में पीछे वो पहचाने नहीं जाते॥ बहुत अच्छी रचना http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/01/19/नारी-और-बेचारा-पुरुष-पति-द/

    January 20, 2012

    सुमित जी नमस्कार ! ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है। आपकी तारीफ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। साभार !

परिचय़ बहल के द्वारा
January 18, 2012

नमस्कार डॉ सूरज आपकी इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक धन्यवाद …

Amita Srivastava के द्वारा
January 18, 2012

डॉ सूरज जी अगर जागरण अख़बार मे न पढ़ा होता तो इस ब्लॉग पे भला कैसे आते . इतनी सुंदर गजल से हम बस यूँ ही मरहूम रह जाते . बधाई

    January 18, 2012

    अमिता जी नमस्कार ! बहुत बहुत शुक्रिया !आपने ग़ज़ल पढ़ा और आपकी सुंदर प्रतिक्रिया मिली अच्छा लगा। अच्छी पंक्तियाँ लिखी हैं आपने ….साभार !

January 18, 2012

मोहब्बत करने वाले छोड़ जाते हैं निशां अपने, जहां से उनके चर्चे और अफ़साने नहीं जाते॥ . सादर नमस्कार डॉ सूरज जी ! ग़ज़ल की खूबसूरती….हर शेर के साथ बढ़ती हुई….और अंत में फिर बात दोहराना चाहूँगा…..इस बार भी…..बेहतरीन इस्तेमाल…तख़ल्लुस का !! :) थोड़ी देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ….पढ़ने लिखने के दिनों में कभी कभार थोड़ी बहुत मशरूफ़ियत हो ही जाती है । आशा है कि आप…. ;)

    January 18, 2012

    संदीप भाई नमस्कार ! आपकी सुंदर प्रतिक्रिया मिली बहुत अच्छा लगा…आज आपका लेख पढ़ा बहुत ही खूबसूरत लिखा है…कहीं से मेरी वेदना को आपने उकेर दिया है ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद !!

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
January 17, 2012

हर बार की तरह इस बार भी आपकी एक शानदार ग़ज़ल … आपकी ग़ज़लें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है | ——————————————————————- आपकी ग़ज़ल देखि तो मैंने भी थोड़ी तुकबंदी कर दी… —————————————————————– शजर ने यूँ तो झेले हैं, खिजां के दौर कितने ही | मगर राही से उसके ग़म, तो पहचाने नहीं जाते || हमेशा कश्मकश की गुत्थियाँ दिल में रखा कीजै | तमाशाई हैं ये ‘सूरज’, ये सुलझाने नहीं आते || ————————————————————– आपको आपकी इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक धन्यवाद …

    January 18, 2012

    शैलेश भाई नमस्कार ! आपकी सुंदर प्रतिक्रिया मिली उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! आपने तुकबंदी नहीं बहुत अछे शेर कह दिये हैं…..अच्छा है जनाब ऐसे ही उत्साह वर्धन करते रहें और अपना हुनर बिखेरते रहें !

Dr. H.N. Singh के द्वारा
January 17, 2012

kya maalik maine to first time tumhe yahan dekha….yakeen nahi aa raha ki itana achchha likhane lago ho…doctori chhod di nkya? time kab paate ho…wapas kab aaye America se ?

    January 18, 2012

    हृदय तुम और जागरण जंक्शन पर…बड़ा अटपटा मेल …यहाँ क्या कर रहो हो डॉ , हाँ यार डाक्टरी मे मन नहीं लगता ……आजकल कहाँ हो ? मैं पिछले साल यूएस से लौटा। मुझे ई मेल करना…

Priya Saxena के द्वारा
January 17, 2012

डाक्टर साहब नमस्कार! बहुत से लोग होते हैं खुशी, इशरत, मसर्रत में, अगर ग़म आए न तो दोस्त पहचाने नहीं जाते॥ क्या बात है. ….बहुत खूबसूरत ग़ज़ल

    January 18, 2012

    प्रिय जी बहुत बहुत नमस्कार ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

Ramesh Sharma के द्वारा
January 17, 2012

डाक्टर साहब, नमस्कार! ग़ज़ल का हर शेर नायाब. दाद क़ुबूल करें  आभार

    January 18, 2012

    शर्मा जी नमस्कार ! आपको ग़ज़ल के कुछ शेर पसंद आए और आपकी दाद मिली उसके लिए आपका बहुत आभारी हूँ। आप अपनि प्रतिक्रियाओं से हमे अवगत कराते रहें…

yogi saraswat के द्वारा
January 17, 2012

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल !

    January 18, 2012

    योगी जी नमस्कार ! आपका ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ! आपका स्नेह मिला और ग़ज़ल आपको पसंद आई उसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

    Prevail के द्वारा
    March 16, 2012

    Nomarlly I’m against killing but this article slaughtered my ignorance.

nishamittal के द्वारा
January 17, 2012

बहुत खूबसूरत रचना बाली जी.

    January 18, 2012

    निशा जी नमस्कार ! आपकी प्रतिक्रिया और स्नेह के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
January 17, 2012

वही रहता हमारे दिल, जिगर, दुनिया की हर शै में उसे हम ढूढ़ने मस्जिद सनमख़ाने नहीं जाते बहुत खूब डॉ, सूर्या जी.फिर से एक अच्छी गजल पेश करने के लिए बधाई ! आभार सहित, ….राजीव

    January 18, 2012

    राजीव जी सादर नमस्कार ! ग़ज़ल को आपकी दाद मिली बहुत अच्छा लगा आपकी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। स्नेह बनाएँ रखें…

jlsingh के द्वारा
January 17, 2012

डाक्टर साहब, नमस्कार! बहुत से लोग होते हैं खुशी, इशरत, मसर्रत में, अगर ग़म आए न तो दोस्त पहचाने नहीं जाते॥ क्या बात कही है आपने! वैसे तो हर पंक्ति लाजवाब है, …. आपने भी उर्दू में महारत हासिल कर ली है! बहुत ही सुन्दर!

    January 18, 2012

    जवाहर भाई नमस्कार ! आपका प्यार और आशीर्वाद मिला बहुत बहुत धन्यवाद । आपके सुंदर शब्दों के लिए आपका आभारी हूँ…..

akraktale के द्वारा
January 16, 2012

बाली जी नमस्कार, पिला देता वो नज़रों से तो मैख़ाने नहीं जाते॥ बहुत खूब गजल लिखी है.मजा आ गया.वाह! वाह!

    January 18, 2012

    अशोक भाई नमस्कार ! ग़ज़ल को आपकी तारीफ मिली अच्छा लगा….ऐसे ही उत्साहवर्धन करते रहें…..बहुत बहुत धन्यवाद !!

shashibhushan1959 के द्वारा
January 16, 2012

आदरणीय डाक्टर साहब, सादर ! “पिला देता वो नज़रों से तो मयखाने नहीं जाते ! यहीं पर टुन्न हो जाते, दवाखाने नहीं जाते !! . वो चाहे मुंबई की हो, नई दिल्ली की हो शीला, जो उसका प्यार मिल जाता, तो बुतखाने नहीं जाते !! . कहें राजा, कनीमोझी, कहें कलमाड़ी चिल्ला के, अगर निर्दोष ये होते, जेलखाने नहीं जाते !! . बहुत अच्छी ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाइयां !!

    January 18, 2012

    डॉ॰ साहब नमस्कार ! जबाग क्या खूबसूरत शेर जोड़े हैं…..बहुत अच्छा लगा आपकी प्रतिक्रिया देने का अंदाज़ । आपके आशीर्वाद के लिए बहुत बहुत आभारी हूँ !

minujha के द्वारा
January 16, 2012

बहुत से लोग होते हैं खुशी, इशरत, मसर्रत में, अगर ग़म आए न तो दोस्त पहचाने नहीं जाते॥ इन पंक्तियों ने तो सबकुछ कह दिया डॉ सुर्या जी बहुत बढिया

    January 18, 2012

    मीनू जी नमस्कार ! ग़ज़ल को आपकी दाद मिली बहुत खुशी हुई…आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका शुक्रिया !!

Dr.Shailesh Gaur के द्वारा
January 16, 2012

great thoughts and composition doctor.

alkargupta1 के द्वारा
January 16, 2012

सूरज जी , ग़ज़ल का हर शेर नायाब है….रचना के लिए बधाई

    January 18, 2012

    अल्का जी को नमस्कार ! आपको ग़ज़ल के शेर पसंद आए और आपकी प्रतिक्रिया मिली …बहुत बहुत शुक्रिया

संजय भारती के द्वारा
January 16, 2012

बहुत खूब, निःशब्द कर दिया….निखार आ रहा है आपके शेरों में

    January 18, 2012

    संजय जी नमस्कार …बस आप लोगों के दुवाएँ हैं जो निखार ला रही हैं क्यूंकी तारीफ मिलने दिल से लिखने का मन करता है… बहुत बहुत शुक्रिया

utpal के द्वारा
January 16, 2012

डॉ साहब क्या बात है ! बहुत से लोग होते हैं खुशी, इशरत5, मसर्रत6 में, अगर ग़म आए न तो दोस्त पहचाने नहीं जाते॥ हासिल ए ग़ज़ल शेर बना है यह दाद क़ुबूल करें उत्पल http://utpal.jagranjunction.com

    January 18, 2012

    उत्पल साहब नमस्कार ! जनाब आप जैसे क़द्रदान से दाद मिलती है बहुत खुशी होती है। आपकी दाद के लिए बहुत शुक्रिया !

mparveen के द्वारा
January 16, 2012

डॉ साहब नमस्कार, मुझे उर्दू का ज्ञान नहीं है फिर भी आपकी ग़ज़ल के निचे दिए गए शब्दार्थ की सहायता से ग़ज़ल को को पढ़ा और समझा …. बहुत सुंदर ग़ज़ल है …. मुझे isme सबसे सुंदर लगी है वो पंकितयां जिसमे कहा गया है की अगर गम न आयें जिंदगी में तो दोस्तों की पहचान नहीं होती है …… बधाई हो आपको खूबसूरत ग़ज़ल के लिए !!!!

    January 18, 2012

    परवीन जी नमस्कार ! आपको ग़ज़ल पसंद आई और आपकी सुंदर प्रतिक्रिया मिली उसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

manoranjanthakur के द्वारा
January 16, 2012

गर हो गम कह देते यु महफील से बिन मुस्कुराए नहीं जाते लाजवाव

    January 18, 2012

    मनोरंजन भाई नमस्कार ! आपको बहुत बहुत धन्यवाद । पूरा मुस्कराने का खेल इसी ग़म को छुपाने के पीछे ही तो है….

allrounder के द्वारा
January 16, 2012

लाजवाव डॉक्टर साहब एक एक पंक्ति प्रभावशाली है आपकी इस रचना के लिए आभार आपका !

    January 18, 2012

    सचिन भाई नमस्कार ! आपकी सुंदर संक्षिप्त प्रतिक्रिया के लिए बहुत आभारी हूँ…धन्यवाद !

Nikhil के द्वारा
January 16, 2012

khoobsurat panktiyan. badhai.


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