दिल की बातें दिल से

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डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"


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आ जाओ फिर से लौट के इक शाम के लिए

Posted On: 7 Aug, 2015  
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कविता में

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दिवाना था मैं पहले भी मगर इतना नहीं था

Posted On: 23 Apr, 2013  
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खुश रहे ज़िंदगानी नए साल में

Posted On: 1 Jan, 2013  
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कटेगी सिर्फ़ दिलासों से ज़िंदगी कब तक

Posted On: 10 Dec, 2012  
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कौन आकर डाल देता है नमक फिर घाव में

Posted On: 23 Nov, 2012  
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चराग मिल के जलाओ अजी दिवाली है

Posted On: 13 Nov, 2012  
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दिल कश्मकश में रहता है अब रात रात भर

Posted On: 22 Oct, 2012  
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लीटर से नापता है मेरा क़द वो आजकल

Posted On: 14 Oct, 2012  
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हालात से हर आदमी हारा है इन दिनों

Posted On: 7 Oct, 2012  
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जान ले लेता है ये पलकें झुकाना आपका

Posted On: 1 May, 2012  
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दुनिया में रह के दुनिया से अंजान रह गया

Posted On: 20 Mar, 2012  
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सबको रोटी दाल जुटाना पड़ता है

Posted On: 15 Mar, 2012  
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डी. जे. ब्लॉग पे धमाल उड़ेला रंग होली में

Posted On: 6 Mar, 2012  
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कर ली आंखे चार तो फिर डर काहे का

Posted On: 2 Mar, 2012  
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अजनबी जबसे हमारी ज़िंदगानी हो गया।

Posted On: 20 Feb, 2012  
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उजाड़ सकता है घर वो बना नहीं सकता

Posted On: 18 Feb, 2012  
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घर समंदर के किनारे पे बनाता क्यूँ है?

Posted On: 3 Feb, 2012  
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हमारे देश की कैसी ये हालत हो रही है(गणतन्त्र दिवस विशेष)

Posted On: 25 Jan, 2012  
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लिख रहा हूँ ख़त किसी के नाम से

Posted On: 20 Jan, 2012  
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शम्आ को छोड़ के अक्सर ये परवाने नहीं जाते

Posted On: 16 Jan, 2012  
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के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

आदरणीय डॉ.साहब ,.सादर अभिवादन आपकी रचनाएं हमेशा बेहतरीन होती हैं ,.... मूरख क्या तारीफ करेगा ,...हर शेर कुछ कहता हुआ ,.बहुत बहुत बधाई ,...आपकी उस्तादी को नमन करते हुए एक प्रयास करता हूँ ,... मार्गदर्शन का प्रार्थी हूँ बेपरवाह हुए जो मंजिल-ए-जिंदगी से परवरदिगार मंजिल देता जरूर है जो ढूँढते है हर चेहरे में राम को खुदा उनके करीब होता जरूर है ग़मों की बरसात में पी नाम का प्याला खुशिओं का उनको देखो चढ़ता सुरूर है कायनात के मालिक का हाथ जिनके सिर हो परखो जरा संभल के नहीं होता गुरूर है बिखर के जुड जाए तो करिश्मा ही होगा मालिक से किया वादा ,निभाना जरूर है टूटेगी मजबूरी छाएगी रौनक नजर-ए-इनायत उसकी नहीं अब दूर है !........सादर आभार सहित हार्दिक अभिनन्दन

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आपकी रचना से प्रेरणा लेकर कुछ लिखने का प्रयास किया है, कृपया आशीर्वाद दें- हम ही जिम्मेदार हैं जो ये हालत हो रही, आज मेरे देश की जो ये दुर्गत हो रही। अपराधियों को वोट दें फिर दोष दें नेताओं को, वोटरों की ये पुरानी मित्र आदत हो रही। संत  था वह इसलिये मारा गया आतंक से, डाकुओं की सच कहा कितनी हिफाजत हो रही। धर्म का चोला पहनकर और ईश्वर नाम से, देखियेगा देश में कितनी तिजारत हो रही। इंसाफ के मंदिर बने नेताओं की कठपुतलियाँ, कैद में संसद के शायद अब अदालत हो रही। कुर्सियां खाली करो अब आ रही जनता यहाँ, संसद को क्या मालुम नहीं बाहर बगावत हो रही। हर तरफ तो लूट भ्रष्टाचार औ आतंक है, दूसरी अब क्रांति की शायद जरुरत हो रही। आपकी बातों को मेरी पूर्णतः है सहमति, बदनाम सुरज जी यहाँ सचमुच सियासत हो रही।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik